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देवभूमि उत्तराखंड

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आखिर क्यों उत्तराखंड को कहते हैं देवभूमि?

उत्तराखंड के सबसे प्रचलित नाम देवभूमि की, जी हाँ ये एक ऐसा लोकप्रिय नाम है, जिससे आज हर सोशल मीडिया फिर चाहे वो फेसबुक हो या फिर इंस्टाग्राम हो आपको ये नाम उत्तराखंड से रिलेटेड पेजेज पर देखने को मिल जायेगा, और मिले भी क्यू न ये सच भी है, यदि आप उत्तराखंड में घूमने  आते हैं या फिर आप यहाँ के निवासी है तो आपको पता होगा की यहाँ पर थोड़ -थोड़ी दूरी पर न जाने कितने  छोटे-बड़े मंदिर (थान) मिल जाते हैं। यहाँ तक की उत्तराखंड में हर घर के अपने देवी-देवता होते हैं जिनके  समय-समय पर पूजा होती रहती है जिसको “जागरी” के नाम से जाना जाता है, और यहाँ के अति उच्च और हिमालयी क्षेत्रों में आपको बहुत से साधु भी मिल जाया करेंगे जो की अपने तप में लीन रहते  है।

भारत के उत्तर में हिमालय की तलहटी में बसा राज्य उत्तराखंड गठन के क्रम में भारत का 27वा  राज्य  है, और हिमालयी राज्यों के क्रम में ११वा। आधुनिक परिपेक्ष में उत्तराखंड को अधिकांश युवा इसको इसकी प्राकृतिक सौंदर्य और केदारनाथ और बद्रीनाथ के लिए जानते हैं और हर साल यहाँ पर लोग माँ प्रकृति का और भगवान भोले की कृपा के लिए आते है। इसके अलावा भी उत्तराखंड और यहाँ के वाशी हमेशा से ही देश के विकाश मैं और देश की उन्नति मैं अपना योगदान देते रहे हैं। भगवान भोले की कृपा, ऐसी मान्यता है की भगवान शिव शंकर का निवास स्थल हिमालय में यहीं है इसलिए उत्तराखंड को देवभूमि के नाम से भी जाना जाता है।

भगवान ने स्वयं अपने हाथों से जो बनाया है इसे। दुनिया की सबसे सुंदर इमारतें और सुख सुविधाओं से सजे आलीशान घर इस देवभूमि की तुलना में रत्ती भर नहीं हैं। 

कहते हैं ऋषि मुनियों ने सैकड़ों साल तपस्या करके इसे दिव्यभूमि बनाया है, जिसका वैभव पाने के लिए श्रद्धालु मीलों की यात्रा करके अपने भगवान के दर्शन को आते हैं। देवभूमि उत्तराखंड, जिसकी हवा में है गंगा आरती की सुगन्ध और शाम स्वयं में समेटे है ढेर सारी शीतलता। चलिए तपोभूमि उत्तराखंड का एक सफ़र, हमारे साथ।

देवभूमि उत्तराखंड: कैसे पड़ा ये नाम

पूरे भारत में देवताओं, देवियों और महान ऋषियों ने जन्म पाया है लेकिन उत्तराखंड को ही देवभूमि कहलाने का गौरव मिला हुआ है। इसके पीछे कई कहानियाँ भी हैं और बहुत सारी सत्यता।

1. पूरे भारत की सबसे विशाल और पवित्रत नदियाँ देवभूमि उत्तराखंड से निकलती हैं। गंगा, यमुना और सरस्वती नदी का उद्गम स्थल है उत्तराखंड।

2. भगवान शिव का ससुराल है उत्तराखंड का दक्ष प्रजापति नगर।

3. पाण्डवों से लेकर कई राजाओं ने तप करने के लिए इस महान भूमि को चुना है। ध्यान लगाने के लिए महात्मा इस जगह को उपयुक्त मानते हैं और आते हैं। कई साधुओं ने यहाँ स्तुति कर सीधा ईश्वर की प्राप्ति की है। पाण्डव अपने अज्ञातवास के समय उत्तराखंड में ही आकर रुके थे।

उत्तराखंड का इतिहास 

महाभारत का लेखन महर्षि व्यास ने इसी देवभूमि उत्तराखंड में किया था। उत्तराखंड की सांस्कृतिक और भौतिक विरासत को दो भागों, कुमाऊँ और गढ़वाल में बाँट सकते हैं। सभी कहानियों में इन दोनों का ज़िक्र ख़ूब मिलेगा। 

जिस देवभूमि उत्तराखंड को तपोभूमि की संज्ञा देते हैं हम, उसको बाद में हमारी ही नस्लों ने ख़ून ख़राबे से गंदा किया। 

उत्तराखंड के ऊपर पुरु वंश ने शासन प्रारंभ किया जिस पर आगे चलकर नंद, मौर्य, कुषाण ने शासन किया। आगे इस पर ब्रिटिशों ने भी राज किया। गढ़वाल के पश्चिमी हिस्से में बनी भगवान बुद्ध की मूर्तियों का निर्माण सम्राट अशोक ने कराया था।

माता सती के दाहिनी आँख के गिरने से “नैनी झील” का निर्माण

इसके अलावा एक मान्यता है की जिस हिमालय में शिव का वास है वो यहाँ है, पौराणिक ग्रंथों के अनुसार  माता सती के पिता राजा दक्ष प्रजापति, कनखल में शासन करते थे जो की हरिद्वार में है, इसके अलावा  माना जाता है “नैनी झील” जो की नैनीताल में है वो माता सती के मृत शरीर को लेकर जब शिव जा रहे थे तो माता सती के दाहिनी आँख के गिरने से “नैनी झील” का निर्माण हुआ।और न जाने कितने किस्से ऐसे है जो इस भूमि को देवभूमि बनाती है, कहते हैं कि सप्तऋषियों ने यहीं पर आकर अपने प्राणो की रक्षा की और फिर यहीं से दुबारा सृष्टि का पुनर्निर्माण हुआ है। उत्तराखंड को अन्य कई नामों से जाना जाता है इनका भी  उल्लेख हमें मुख्यतः हिन्दू और बौद्ध ग्रंथों से मिलता हैं|
इनका भी उल्लेख हमें मुख्यतः हिन्दू और बौद्ध ग्रंथों से मिलता हैं, कहा जाता है कि उत्तराखंड का  सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है जिसमे इसको देवभूमि या ऋषियों की पूर्ण भूमि कहा गया है, जैसा कि हम पहले बात कर चुके हैं। इसके अलावा भी उत्तराखंड को ‘ऐतरेय ब्राह्मान्य’ में उत्त्तर कुरु कह के सम्बोधित किया गया है| इसके अलावा पाली भाषा में लिखित बौद्ध साहित्यों में उत्तराखंड को हिमवंत कहा गया है, चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी अपनी पुस्तक ‘सी-यू-की’ में उत्तराखंड के क्षेत्र को पो’-ली-ही-मो-पो-लो’ और हरिद्वार को ‘मो-यू-लो’ कहा है।इन सबके अलावा उत्तराखंड का सर्वाधिक उल्लेख हमें स्कंदपुराण में  मिलता है ,स्कंदपुराण शिव और पार्वती के पुत्र स्कन्द जिन्हे भगवान कार्तिकेय भी कहा जाता है और दक्षिण भारत में जिन्हे मुरगन कहते  हैं। इस महापुराण में उत्तराखंड का उल्लेख मिलता हैं, स्कन्द पुराण में जिन 5 हिमालयी खंडो का विवरण मिलता है उनमे से दो खंड “केदारखंड और मानसखंड” के बारे में इतिहासकारों का मानना है कि ये दोनों उत्तराखंड में ही हैं। जहाँ केदारखंड को गढ़वाल और मानसखंड को कुमाऊँ का पूरा भाग माना गया है और  ऐसा माना गया है की नंदा देवी पर्वत श्रृंखला इन दोनों की सीमाओं को अलग करती है।

उत्तराखंड का “माणा गाँव” जिसे की देश का आखरी गांव भी कहते है धर्मराज युधिष्ठिर इसी जगह  स्वर्ग गए थे।

इसके अलावा भी ऐसे अनेक पौराणिक कहानियां और तथ्य हैं जो की उत्त्तराखंड कि देवभूमि होने कि पुष्टि  करते हैं जैसे की महाभारत के वन पर्व में भी उत्तराखंड का उल्लेख मिलता है ऐसा माना गया है की कुरुक्षेत्र  में अपने सगे-सम्बन्धियों कि हत्या करने के बाद इसका पश्च्याताप करने के लिए सभी पांडव हिमालय की और जाते हैं और वो रास्ता उत्तराखंड के “माणा गाँव” जिसे की देश का आखरी गांव भी कहते है, से ही गुजर के गए थे। महाभारत के अनुसार ऐसा माना जाता है, की जब सभी पांडव एक एक कर के अपना शरीर त्यागते गए और अंत में जब सिर्फ धर्मराज युधिष्ठिर ही बचते हैँ तो वो इसी जगह (उत्तराखंड) से स्वर्ग गए थे। इसके अलावा भी ऐसे न जाने और कितने प्रमाण है जिनके विषय में यदि बात की जाये तो शायद कभी खत्म ही न हो। इसीलिए शायद किसे ने सही ही कहा है कि अच्छे लोगो और अच्छी जगहों के बारे में शब्दों में बयां करना मुश्किल होता है। फिर भी हमने आपको उत्तरखंड क़े पौराणिक महत्व क़े बारे में एक संक्षिप्त  वर्णन देने का प्रयत्न किया है |

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